पिछले कई सालो की तरह इस साल के होली की सुबह भी "रंग बरसे" इसी गाने से हुई| फर्क सिर्फ इतना था की इस ये गाना फसबूक पर सुना| वही सुबह थी, वही मन में उत्साह| वही घर वालो को त्यौहार की बधाई देना, वही मिठाई बनाना.... पर....
सब कुछ तो वही था.........फिर क्यों अलग अलग सी लग रही थी ये होली?
क्या शायद इसलिए की इस साल भाई के साथ बैठकर, रातो को देर तक जागकर पिचकारी और गुब्बारों में रंग भरने की तैयारी नहीं की, या इसलिए की इस सुबह नींद मालपुओ के तले जाने की खुशबू से नहीं खुली, या घर से बहार भागते वक़्त दादी की आवाज़ नहीं सुनी..." बच्चो, बहार निकलने से पहले तेल लगा लो, रंग जल्दी उतर जायेगा"
बचपन में तो होली की शुरुआत हिरन्यकश्यप और प्रल्हाद की कहानिओ से होती रही, जब थोड़े बड़े हुए तब नयी नयी शैतानियो से और आज होली जैसे शोरगुल भरे और मनोरंजक दिन की शुरुआत एक अज्ञात देश की चुप्पी से हो रही है!
यह सब सोचकर ही मन बैठ सा जा रहा था | बोहोत सालो पहले पढ़ी सुभद्रा कुमारी चौहान जी की एक कविता याद आ रही थी -
बार-बार आती है मुझको मधुर याद बचपन तेरी।
गया ले गया तू जीवन की सबसे मस्त खुशी मेरी॥
चिंता-रहित खेलना-खाना वह फिरना निर्भय स्वच्छंद।
कैसे भूला जा सकता है बचपन का अतुलित आनंद?
खेलते खेलते कब हम फिर से बच्चे बन गए| राह चलते लोगो के आश्चर्य की परवाह तक नहीं की हमने| कितने ही आये गए, कुछ रुक कर हस दिए, कुछ बिना रुके ही चलते रहे, और कुछ लोगो ने तो गुस्से में हमारी तरह देख कर शायद हमारे पागल होने का अनुमान भी लगा लिया होगा| पर हम सिर्फ उस पल की ख़ुशी में खो गए|
एक बार रुक कर देखा - हर साल की तरह इस साल भी रंगे हुए कपडे थे और मस्ती में झूमते दोस्त| वही गाने और वही धूम| वही दोस्तों को जबरदस्ती रंग लगाने की ख़ुशी और वही हवा में गुलाल उड़ाने की मौज|
शायद .....इतनी अलग भी नहीं थी ये होली!
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